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किसके जूते, किसके पैर

अक्सर जूतों के बारे में बात करने पर जूतमपैजार जैसा भाव आ जाता है। ऐसा लगता है, जैसे जूते का काम आपके चरणों को कमल बनाए रखने का नहीं, किसी के माथे को संबोधित करने का है। आते-जाते पनहियां किसी और की घिसती हैं, मगर बिवाई के अर्थशास्त्र पर व्याख्यान देने वाले कोई और होते हैं। इससे फटे जूते वाला तो वहीं रह जाता है, लेकिन व्याख्याताओं के गरीबपरवर होने का धंधा चल पड़ता है।



कहते हैं, हर फटे जूते में जमीन और कांटे का आख्यान छुपा होता है, जिससे व्यक्ति अपना भविष्य बनाता है। अकबर इलाहाबादी का अनुभव था, बूट डासन ने बनाया मैंने एक मजमूं लिखा, मुल्क में मजमूं न फैला और जूता चल गया। दूसरी तरफ, जूते उतरवा कर पैर धुलवाने के बाद नाव पर चढ़ाने के पीछे एक किस्म का रामायणकालीन भाव रहता है कि चरण कहीं नाव को जीती-जागती हस्ती में न बदल दें। वर्ना उनका तो चमत्कार हो जाएगा, यहां अपनी रोजी-रोटी चली जाएगी।

जूतों की हस्ती पर सबने अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग बात की है। संसद वगैरह में इनके उपयोग पर मर्मस्पर्शी प्रयोग हुए हैं। पर अमूमन यह सब मानते हैं कि सही जूते में सही पैर होना चाहिए। वर्ना, या तो जूता फट जाता है या पांवों में छाले पड़ जाते हैं। कहते हैं बेटे के पैरों में जब पिता के जूते आने लगें, तो उसे दर्जा बदलकर दोस्त में तब्दील कर लेने में ही भलाई है। अंग्रेजी की कुछ कहावतें जूते को योग्यता के एक सांचे की तरह पेश करती हैं। औकात और सामर्थ्य के अनुपात को जूते के मुहावरे में फिट कर दिया गया है। परसाई ने लिखा था, लोग भूल जाते हैं कि कुछ जूते सिरे के नाप के भी बनाए जाते हैं।

जूतों पर इतनी पंचायत इस बार इसलिए कि रोमन क्रज्नेरिक नामक सज्जन ने एक म्यूजियम बनाने का ऐलान किया है। यह म्यूजियम 'एम्पेथी' (समानुभूति) की उनकी अवधारणा पर आधारित है। एक किताब लिखकर समानुभूति-क्रांति शुरू करने वाले रोमन की बात सीधी है, 'अगर हमें दूसरों को समझना है, तो सचमुच उनके जूतों में पैर रखकर चलना पड़ेगा।' पिछले दशकों में हम दूसरों को समझना ही भूल गए हैं। हमें सिर्फ अपनी दुनिया, अपना मन, अपनी हैसियत छोड़कर बाकी को देखने की फुरसत तक नहीं रही। हम स्वकेंद्रित हैं, दूसरों का दुख तो क्या समझेंगे? अगर हम दूसरों के जूतों में पैर रखकर चलें तो उस समझ से रिश्तों में चमत्कार हो जाएगा।


रोमन ने अपने भीतर झांकने के बजाय, दूसरों के भीतर झांकने की तरकीब पर भरोसा किया है। इसी सितंबर में वे दुनिया के पहले 'एम्पेथी म्यूजियम' को लंदन से शुरू करेंगे। एक हिस्से में जैसे ही आप घुसेंगे जूते पहनाने वाला सहयोगी आपको किसी ऐसे आदमी के जूते पहनाएगा जिसकी जिंदगी आपसे बिल्कुल अलग रही होगी। उन्हें पहनकर आप एक मील चलेंगे। एक ऑडियो के जरिये जूतों के असली मालिक की जिंदगी से आप रूबरू होते जाएंगे। इस तरह जिसके जूतों में आपके पैर होंगे, उसकी जिंदगी से आपका रिश्ता बन जाएगा। डर्बी चैंपियन से लेकर गटर साफ करने वाले तक के जूते यहां होंगे।


रोमन ने साथ-साथ एक और इंतजाम किया है। 'ह्यूमन लाइब्रेरी' भी म्यूजियम में होगी, जहां आप किताब के बजाय आदमी इश्यू कराएंगे। कोई सीरियाई शरणार्थी, कोई वॉल स्ट्रीट का बैंकर या कोई और...आप चुनें और उससे खुली, ईमानदार बातचीत करें। जैसे, किताब पढ़ें, जैसे पूरा जीता-जागता आदमी पढ़ें। जिएं और बदल जाएं। कानून बनाने, नीतियां तैयार करने या ऊंची-ऊंची सीख देने से बेहतर है एक-दूसरे के जूते में पैर रखकर एक मील घूमना या आदमी को भीतर तक पढ़ लेना।


मंदिर के बाहर सब जूते चोरी हो जाएं और दूसरों के पैरों में नजर आएं, तो क्या भक्ति का लेवल हाई होगा? सिद्धांत कहता है, तब चोरी मुख्य तत्व होगी इसलिए विचार पैरों के जरिये दिमाग तक पहुंचने से पहले ही मर जाएगा। अकेले जूतों के भरोसे ईमान ट्रांसफर करने की उम्मीद में मत रहना।


लिहाजा, अगर जूता-समझ क्रांति करनी है तो इरादे का ईमान पहली शर्त है। एक बार हाफिज सईद के जूतों पर यह प्रयोग हो तो क्या हो? दाऊद इब्रािहम के जूतों से जितना समझ में आएगा, मराठवाड़ा के किसान के जूते से निरस्त हो जाएगा। खुद आतंकी इस्लामिक स्टेट वाले जरा किसी गरीब हिंदुस्तानी मुसलमान के जूते पहनकर एक मील चलें तो सारा नक्शा ही बदल जाएगा।


ओवैसी साहब के पैरों में तोगड़िया जी के जूते हों और पहले दोनों अलग-अलग, फिर साथ-साथ एक मील चलें तो कैसी समझ-क्रांति हो? कश्मीर वाले काशी के जूतों में विचर रहे हैं और कबीर फूट पड़े हैं।


तेरे जूते, मेरे पैर। मेरे जूते, तेरे पैर। समानुभूति का अद्भुत वातावरण। जूते सिरों पर नहीं, दिमाग की तरंगों में जिंदगी के मील अंकित कर रहे हैं,सब ईमान से ईमान को समझ रहे हैं।


फिर जूते क्यों चलेंगे? फिर जूतम-पैजार कैसे होगी? फिर तो सब जमीन से कांटे बुहार लेंगे और तब किसी को जूतों की जरूरत ही नहीं रहेगी।


सुंदर सपना है।


लेकिन, लोग चाहते हैं मंदिर से जूते चुराएं और जीवन बदल लें।


चुराए हुए जूतों में पटना, पटाया और पामीर का पठार एक जैसे होंगे।


तो, मान लीजिए! जूते और ईमान साथ रखिए। अदल-बदल होगी तो भी, ईमान से जूता चलेगा और सही चलेगा।



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