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महापुरुषों का मार्केट

मूर्ति पर पड़ी बीट साफ करते हुए उस नौजवान ने बताया कि जिस ठेका कंपनी के जरिये वह सफाई के काम में लगा है, उसने उसका प्रॉविडेंट फंड तीन साल से जमा नहीं करवाया है।

‘इन तीन सालों में मैं गांधी, अंबेडकर, तिलक, नेहरू, पटेल समेत कई लोकल नायकों की मूर्तियां प्रोग्रामों के पहले साफ कर चुका हूं। कई बार तो लगता है कि कबूतर-कौए भी तीन साल से वही के वही हैं। जयंतियों-पुण्य तिथियों के आस-पास मदद करने के लिहाज से थोड़ी कम बीट करते होंगे। लंबी पहचान से उनके मन में, मेरे प्रति दया-माया है। मुझे कम रगड़ाई करना पड़े, यह तो वे सोच ही सकते हैं।’

‘तुम्हें पता होता है कि किस तारीख को कौन-सी मूर्ति की सफाई होनी है?

‘कह देते हैं। वर्ना मैं तो सफाई के वक्त वही कपड़ा, वही पानी, वही साबुन, वही लोहे की पत्ती रखता हूं। मुझे क्या फर्क पड़ता है? मूर्ति नेहरू की साफ करो या नंदकिशोर की। वही रगड़ाई, वही धुलाई, वही कबूतर, वही मजदूरी।’

‘तुम्हें यह नहीं लगता कि यहां सफाई करने से उत्तम विचार आते हैं। जैसे अभी इसी हफ्ते नेहरू को प्रणाम करने से कांग्रेस के मन में शक्ति का संचार हुआ है।’ ‘नेहरू तो पहले भी वहीं खड़े थे, अभी भी वहीं खड़े हैं। मैं उनकी सफाई मजदूरी के लिए उसी तरह करता हूं, जिस तरह भगत सिंह या सुभाषचंद्र बोस या शिवाजी की करता हूं। मेरे उत्तम विचार ठेकेदार की जेब से प्राप्त होते हैं।’

‘तुम्हें शक्ति लेनी चाहिए। उत्तम विचार तो हृदय परिवर्तन कर देते हैं। तुम्हारा भविष्य बदल जाएगा।’ ‘मुझे अपना ठेकेदार बदलना है।’

‘अचरज की बात है। तुम्हारी सोच का दायरा कितना छोटा है। राहुल गांधी से सीखो। उन्होंने नेहरू की तलवार से मोदी को खत्म करने का विचार व्यक्त किया है।’ ‘नेहरू की तलवार तो सालों से पड़ी थी। समझ में नहीं आ रहा, अभी कैसे निकली?’

‘जब जरूरत हो, तभी निकालनी होती है। जैसे अभी उन्हें याद आया कि अरे ये तो अंग्रेजी को भी खत्म कर देंगे। अब अंग्रेजी के लिए भी व्यवस्था देखनी पड़ेगी।’ ‘आप मुझ सफाई वाले से इतनी ऊंची बातें क्यों कर रहे हैं?’ ‘इसलिए कि तुम गांधी-नेहरू-पटेल-अंबेडकर सबको साफ करते आए हो।’

‘पर मैं तो बार, मंदिर, मस्जिद, कपड़े, फर्श-सब साफ करने को तैयार हूं। आप तो एक नया ठेकेदार बताएं, जो मेरा प्रॉविडेंट फंड जमा कर दे, पैसे दोगुने कर दे और सफाई का नया सामान दे दे-इतना काफी होगा। नेहरू की बैटरी से कांग्रेस की टॉर्च जलती हो तो, वह जाने। मुझे इसमें क्यों घसीटते हैं।’ ‘मैं तुम्हारी उन्नति चाहता हूं। स्वप्नशील भारत के प्रसन्नचित्त नागरिक को रोशनी चाहिए तो उसे बैटरी और टॉर्च वालों से रिश्ते जोड़ने पड़ेंगे।’

‘फिलहाल मेरी प्राथमिकता उचित ठेकेदार की तलाश है।’ ‘टॉर्च की रोशनी हर तलाश में मददगार हो सकती है।’ ‘पर टॉर्च किसी और के पास है। साठ साल से किसी न किसी के पास रहती आई है। मेरी उम्र ज्यादा नहीं है। मुझे तो अपनी जुगाड़ के उजाले से काम चलाना पड़ता है। मैं जीना चाहता हूं। मुझे गुड़गांव में जमीन नहीं चाहिए। उस जमीन पर कोई काम चला रहा हो तो उसमें लग जाना काफी होगा।’ ‘तुम बड़ा नहीं सोच सकते?’

‘मैं तो महापुरुषों की मूर्तियों की बड़ी साइज से भी डरता हूं। ज्यादा देर सफाई करनी पड़ती है। दोहरा काम हो जाता है। पत्ती घिसते-घिसते हाथों में दर्द हो जाता है। पानी भी ज्यादा लगता है, मेहनत भी। आप क्या मार्केट में ऐसी कोई   हवा नहीं चला सकते कि मूर्तियां छोटी बनें, नीचे लगें और सफाई के लिए उसे ही लगना पड़े, जिसे उस महापुरुष की बैटरी से अपनी टॉर्च जलानी हो?”

‘तुम्हारा रोजगार छिन जाएगा। महापुरुषों के मार्केट के चलते तुम्हें जो सफाई मजदूरी मिली हुई है, उससे भी हाथ धो बैठोगे।’ वह मूर्ति से नीचे उतर आया। गंदा कपड़ा, मटमैले पानी से भरी बाल्टी, सफाई का बाकी सामान एक तरफ रखा और मूर्ति की तरफ देखने लगा। वह उधर देखते हुए स्थिर हो गया है। लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, उसे देख रहे हैं।

शक है कि उसकी देह मूर्ति में बदल रही है। ठेकेदार को पता चल गया है। उसने उसका नाम अपने रजिस्टर से उड़ा दिया है। कांग्रेस का कहना है, यह सांप्रदायिक ताकतों का खेल है कि जीता-जागता गरीब मूर्ति में बदल गया। भाजपा का कहना है, अच्छे दिन आ रहे हैं क्योंकि आम-आदमी भी अब मूर्ति के योग्य हो गया है।

यह कोई नहीं बता रहा कि महापुरुषों के मार्केट में इस प्रॉविडेंट फंड के सपने वाले सफाईकर्मी का दाम क्या होगा?

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